नीचे प्रेम की प्राप्ति और जीवन में सामंजस्य लाने के उद्देश्य से माता दुर्गा का एक नया, शुभ शाबर मंत्र दिया जा रहा है। यह किसी पर अनुचित नियंत्रण की भावना नहीं रखता, बल्कि सकारात्मक आकर्षण, सौहार्द और मंगलकामना पर आधारित है।
इस मंत्र की साधना सरलीकृत साधना प्रणाली पाठ का पालन करते हुए सरल रूप से की जा सकती है। साधक सबसे पहले अपने आसन और दिशा को शुद्ध भाव से निश्चित करे, फिर माता दुर्गा की मानसिक या मूर्त रूप में शांत भाव से उपासना करें। इसके बाद कुछ क्षण प्राणायाम द्वारा मन को स्थिर करें और फिर प्रेम, शुद्ध भावनाओं तथा जीवन में मंगलमय परिणाम की भावना रखते हुए इस मंत्र का जप आरंभ करें। सरलीकृत साधना प्रणाली पाठ में बताए गए मूल सिद्धांत का पालन करने से यह साधना अधिक फलप्रद होती है। साधक को प्रतिदिन निर्धारित समय पर शांत स्थान में बैठकर श्रद्धा और विश्वास के साथ मंत्र का जप करना चाहिए।
ॐ दुर्गे देवी करुणा मइया।
सुखदायिनी प्रेम वरदइया।
हृदय सुधरै मोर मन चाहा।
मंगल कर तू मातु दयाला।।
इस मंत्र की १ से ३ अथवा यथा संभव मालाओं का जप २१ दिनों तक अथवा तबतक करें जबतक की आपको आपका प्रेम प्राप्त ना हो जाये।
अब इसकी क्रमवार व्याख्या।
ॐ दुर्गे देवी करुणा मइया।
इस पंक्ति में साधक माता दुर्गा को करुणा और दया की मूर्ति के रूप में स्मरण करता है और उनसे कृपा की प्रार्थना करता है।
सुखदायिनी प्रेम वरदइया।
यहां माता से यह निवेदन है कि वह सुख देने वाली हैं और प्रेम (सच्चे, शुभ, पावन प्रेम) का वरदान प्रदान करने वाली शक्ति हैं।
हृदय सुधरै मोर मन चाहा।
यह पंक्ति बताती है कि प्रेम प्राप्ति के लिए पहले हृदय का शुद्ध, शांत और संतुलित होना आवश्यक है। साधक कहता है कि मेरा हृदय पवित्र हो और मेरा मन जिस शुभ प्रेम की इच्छा करता है, वह सफल हो।
मंगल कर तू मातु दयाला।।
अंतिम पंक्ति में माता से आशीर्वाद माँगा गया है कि वह साधक के जीवन में मंगल और सौभाग्य लाएँ और उसकी इच्छा को सफल व शुभ बनाएं।
सार रूप में यह मंत्र माता दुर्गा से शुभ प्रेम, हृदय की शुद्धता, संबंधों में सामंजस्य और जीवन में मंगल परिणाम देने की प्रार्थना है।
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