प्रेम प्राप्ति हेतु माता दुर्गा का शाबर मंत्र

नीचे प्रेम की प्राप्ति और जीवन में सामंजस्य लाने के उद्देश्य से माता दुर्गा का एक नया, शुभ शाबर मंत्र दिया जा रहा है। यह किसी पर अनुचित नियंत्रण की भावना नहीं रखता, बल्कि सकारात्मक आकर्षण, सौहार्द और मंगलकामना पर आधारित है।

इस मंत्र की साधना सरलीकृत साधना प्रणाली पाठ का पालन करते हुए सरल रूप से की जा सकती है। साधक सबसे पहले अपने आसन और दिशा को शुद्ध भाव से निश्चित करे, फिर माता दुर्गा की मानसिक या मूर्त रूप में शांत भाव से उपासना करें। इसके बाद कुछ क्षण प्राणायाम द्वारा मन को स्थिर करें और फिर प्रेम, शुद्ध भावनाओं तथा जीवन में मंगलमय परिणाम की भावना रखते हुए इस मंत्र का जप आरंभ करें। सरलीकृत साधना प्रणाली पाठ में बताए गए मूल सिद्धांत का पालन करने से यह साधना अधिक फलप्रद होती है। साधक को प्रतिदिन निर्धारित समय पर शांत स्थान में बैठकर श्रद्धा और विश्वास के साथ मंत्र का जप करना चाहिए।

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प्रेम प्राप्ति हेतु माता काली का शाबर मंत्र

यदि आपका उद्देश्य प्रेम, साहस, स्पष्टता और उचित संबंध पाने के लिए काली माता की कृपा माँगना है, तो उसके लिए एक सुरक्षित, शुभ और नैतिक शाबर प्रार्थना दे सकता हूँ। यह प्रार्थना किसी व्यक्ति पर नियंत्रण नहीं करती बल्कि आपके जीवन में सही प्रेम आने के लिए आशीर्वाद माँगती है।

यह माता काली से सही, सत्‍त और परस्पर प्रेम का आशीर्वाद माँगने का एक पवित्र तरीका है। इस मंत्र की साधना आप सरलीकृत सामान्य साधना प्रणाली पाठ का पालन करते हुए कर सकते हैं।

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सरलीकृत सामान्य साधना प्रणाली

चलिए अब हम सम्पूर्ण साधना प्रणाली का सरलीकरण कर देते हैं जिससे समय के आभाव में भी आप बड़ी ही सरलता से अपनी साधनायें पूर्ण कर सकेंगे।

  • एक शांत और एकांत स्थान का चुनाव करें, रात्रि काल उत्तम रहेगा।
  • यदि देवी साधना है तो लाल कम्बल का आसान लगायें अन्यथा साधना के अनुसार आसन के रंग का चुनाव करें, आपका मुख पूर्व, उत्तर अथवा उत्तर-पूर्व दिशा की ओर हो। दक्षिण दिशा की ओर काली की उग्र साधनायें करने का विधान है।
  • आसान, और स्वयं को गंगाजल अथवा षट्कर्म विधि अनुसार पवित्र करलें
  • सबसे पहले गुरु मंत्र अथवा ॐ गुरुवे नमः का एक २१ बार अथवा १ माला जप करके गुरु का ध्यान करें, यदि गुरु नहीं है तो शिव को गुरु मानकर साधना शुरू करें।
  • अब ॐ गं गणपतये नमः का १ माला का जप करें।
  • अब ॐ नमः शिवाय का १ माला का जप करें।
  • अब सहायक देवताओं के मंत्र के मंत्र कर सकते हैं जैसे दुर्गा व काली साधना में भैरव मंत्र ॐ ह्रीं भैरवाय नमः की १ माला का जाप करें, इसी प्रकार लक्ष्मी साधना है तो नारायण मंत्र अथवा स्मरण, इत्यादि।
  • अब उस देव अथवा देवी का ध्यान अथवा स्तुति करें और न्यास आदि सहित अथवा उसके बिना साधना मंत्र (जो भी आप करना चाहते हैं) की संकल्पित माला (अर्थात जितनी भी माला करने का आपने संकल्प किया हो) का जप करें।
  • अब किया हुआ जप देवी को गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्⁠। सिद्धिर्भवतु मे देवि (अथवा देव) त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि (अथवा सुरेश्वर)।। ⁠मंत्र बोलकर अथवा श्री देवी(अथवा देव का नाम) अर्पणम अस्तु अथवा बिना कुछ बोले सिर्फ सोंच कर समर्पित कर दें।
  • यदि संभव हो तो अंत में सिद्धकुंजिका स्तोत्र का एक पाठ करें।
  • अब भूल चूक के लिए क्षमा मांगे, इसके लिए आप यह क्षमा-प्रार्थना भी पढ़ सकते हैं – आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्⁠। पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि।⁠।⁠ मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि । यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे⁠।⁠।⁠ अथवा मन में साधना के दौरान हुई भूल-चूक के लिये क्षमा मांग सकते हैं।
  • कुछ देर शांत बैठ कर माता (अथवा जिनकी भी साधना कर रहे हैं) का ध्यान करें, इसके लिए आप सांस को ध्यान पूर्वक अंदर लें और बहार छोड़ें, साधना सफल होने के साथ इसी दौरान आपको कुछ अलौकिक अनुभव भी हो सकते हैं।
  • अब आसान को प्रणाम करके उठें। इसके लिए आप आसान के समक्ष कुछ बूँद जल की गिराकर उनको अपने मस्तक पर लगा सकते हैं।

साधना काल में जप के दौरान उक्त विधि को दोहराते रहें, निश्चित समय पर ही साधना के लिए बैठे और संकल्पित माला पूर्ण करके ही उठने का प्रयास करें।

साधना व उपासना के षट्कर्म

आसन शुद्धि, पवित्रीकरण, शिखाबंधन, तिलक, आचमन, और कवच यह सब उपासना के षट्कर्म में आते हैं जिन्हे आप अपनी आव्यशक्ता अनुसार कर सकते हैं।

आसन शुद्धि – आसन को बिछा दें और उसे पानी के छींटे देकर पवित्र कर लें, इसके लिए या तो आप आसान पवित्रीकरण मंत्र पढ़ सकते हैं – 

ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका देवि! त्वं विष्णुना धृता ⁠। 

त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम् ⁠।⁠।

यदि यह मंत्र न पढ़ सकें तो ॐ नमः शिवाय अथवा गायत्री मंत्र बोल कर छींटे देदें अथवा सिर्फ गंगाजल छिड़कने से भी काम हो जायेगा।

सरलीकरण – आप इष्ट का नाम जपते हुए भी आसान पर जल का छिड़काव कर सकते हैं, इससे भी आसान पवित्र माना जायेगा।

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शिव नाम जप की महिमा

आध्यात्मिक उत्थान व् आंतरिक शांति से शारीरिक स्वास्थ्य व् भौतिक समृद्धि देने वाला है शिव का नाम। हमारे शास्त्रों और पुराणों में भगवान शिव ने स्वयं बताया है कि हे वरानने, मेरा ‘शिव’ नाम ही सर्वोत्तम है, वही परब्रह्म है, ‘शिव’ यह नाम मुझ ब्रह्मकी अभिव्यक्ति है, शिव नाम से यथार्थ में मुझे ही समझो। जो वेदान्त से प्रतिपादित अव्यक्त ब्रह्म है, द्वैक्षर शिव भी वही है । दो अक्षरों का यह शिव नाम परब्रह्म स्वरूप एवं तारक है, इससे भिन्न कोई तारक नहीं।

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महादेव शिव शम्भू का नाम

भगवान शिव, जिन्हें महादेव या शंकर के नाम से भी जाना जाता है, सनातनी देवताओं के प्रमुख देवताओं (त्रिदेवों) में से एक हैं और इसमें सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उन्हें विनाश, परिवर्तन, ध्यान और तपस्या के सर्वोच्च देवता के रूप में पूजा जाता है। हमारी पौराणिक कथाओं में, भगवान शिव को अक्सर कैलाश पर्वत पर ध्यान करते हुए एक योगी के रूप में चित्रित किया गया है, जिनके माथे पर तीसरी आंख है, उनके बालों पर एक अर्धचंद्र है, उनके हाथ में एक त्रिशूल है और उनकी गर्दन के चारों ओर एक सांप लिपटा हुआ है।

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